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Tuesday, May 12, 2020
जफर अहमद खान
रमजानुल मुबारक एक पवित्र और बरकत वाला महीना है, इसे बहुत सारी विशेषताएं और कुछ प्रमुख गुण प्राप्त हैं, जिसका अंदाजा प्रेषित मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम की हदीस से लगाया जा सकता है, हजरत अबू हुरैरा रजिअल्लाहू अन्हो का वर्णन है कि नबी ए करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने फरमाया "जो व्यक्ति ईमान की अवस्था में पुण्य की नियत से रमजान के रोजे रखता है उसके पिछले पाप बख्श दिए जाते हैं", रमजान का एक-एक क्षण अत्यंत महत्वपूर्ण और सआदतो वाला है, अर्थात अन्य ग्यारह माह मिलकर इसकी बराबरी नहीं कर सकते, अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रमज़ान की अंतिम दस रातों में नमाज़, क़ुर्आन की तिलावत और दुआ में जितना परिश्रम और संघर्षकरते थे उतना परिश्रम संघर्ष उनके अलावा अन्य रातों में नहीं करते थे। इमाम बुखारी और इमाम मुस्लिम ने आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत किया है कि : "जब रमज़ान की अंतिम दस रातें प्रवेश करती थीं तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम रात को (इबादत करने के लिए) जागते थे औ अपने परिवार को भी (इबादत के लिए) बेदार करते थे और तहबंद कस लेते थे।" (अर्थात संभोग से दूर रहते थे, या इबादत में कड़ा परिश्रम करते थे), तथा अहमद और मुस्लिम की रिवायत में है कि : "आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अंतिम दस रातों में (इबादत करने में) जो परिश्रम और संघर्षकरते थे वह उनके अलावा अन्य रातों में नहीं करते थे।", हम यहां इस पवित्र महीने के अन्तिम अशरे(दस दिनों) की दो महत्वपूर्ण इबादत को संक्षेप में जानने का प्रयास करेंगे इन्शाअल्लाह।ऐतिकाफ(एकांतवास): पहली इबादत जो इस महीने के आखिरी दस दिनों में उम्मते मुस्लिमा को प्रदान की गई है उसे ऐतिकाफ कहा जाता है, एतिकाफ का अर्थ है रुकना और ठहरना, अल्लाह की खुशी प्राप्त करने के लिए इबादत, जिक्र अज्कार करने की नियत से विषेश तरीके से एक समय के लिए मस्जिद में ठहरने का नाम एतिकाफ है, एतकाफ में बैठने वाले को दो हज और एक उमरे का सवाब मिलता है, यह सुन्नते मुअक्कदा अलल किफाया है, अर्थात कोई एक व्यक्ति एतिकाफ के लिए बैठता है तो सारी आबादी गुनहगार होने से बच जाती है, परंतु अगर किसी मस्जिद की आबादी से कोई एतिकाफ में नहीं बैठता है तो वह पूरी आबादी गुनहगार होती है, एतकाफ में बैठने वाला व्यक्ति फुजूल(बेकार) की बातचीत, खानपान और नींद से दूर रहने का प्रशिक्षण प्राप्त करने के साथ ही अल्लाह की इबादत, कुरान की तिलावत, तौबा की आदत एवं अपने आप को समझने का मौका प्राप्त करता है, और एतकाफ से व्यक्ति गुनाहों से दूर रहता है,
एतिकाफ हर वक्त सुन्नत है और सबसे बेहतर रमजान के आखिरी दस दिनों में इतिकाफ करना है, क्योंकि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम रमजान के आखिरी दस दिनों में हमेशा एतिकाफ किया करते थे (जादुल मआद), हजरत आयशा रजि अल्लाह ताला अन्हा फरमाती हैं कि रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो अलेही वसल्लम इस फानी दुनिया से पर्दा फरमाने तक रमजान के आखिरी दस दिनों में ऐतिकाफ किया करते थे और उनके बाद उनकी अज्वाजे मुतह्हरात (पत्नियां) ऐतिकाफ किया करती थी (बुखारीी, हजरत अबू हुरैरा रजिअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रसूलअल्लाह सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम हर साल रमजान में दस दिन का ऐतिकाफ किया करते थे लेकिन जिस साल आप सल्लल्लाहो वाले वसल्लम उसदुनिया से पर्दा फरमाया उस साल आप सल्लल्लाहु अलैहि सल्लम ने बीस दिन का ऐतिकाफ किया था (बुखारी),
अतः जो व्यक्ति रमज़ान की अंतिम दहाई में एतिकाफ करने में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का अनुसरण करना चाहता है तो वह रमज़ान की इक्कीसवीं रात को सूरज डूबने से पहले मस्जिद में प्रवेश कर जाए, ताकि उसमें से कोई चीज़ उस से न छूटने पाए, और ईद की रात सूरज डूबने के बाद बाहर निकले, चाहे महीना पूरा हुआ हो या कम हो गया हो, और सर्वश्रेष्ठ यह है कि वह ईद की रात मस्जिद में ठहरा रहे यहाँ तक कि उसमें ईद की नमाज़ पढ़ ले, या उस से निकल कर ईद की नमाज़ के लिए ईदगाह जाए यदि लोग ईदगाह में नमाज़ पढ़े।
एतिकाफ की हिकमत यह है कि इसके द्वारा आदमी कुछ समय के लिए दुनिया से कट जाता है, दुनिया और दुनिया वालों के साथ व्यस्तता से बच जाता हैै, और अल्लाह की उपासना के लिए एकांतमय हो जाता है, रब को राजी करने वाले कार्यों में व्यस्त होकर नाफरमानी और अल्लाह को नाराज कर देने वाले कार्य से बच जाता है, इसलिए हमें भी समय निकाल कर अपने दिल को अल्लाह की इबादत के लिए लगा देना चाहिए।
लैलतुल कद्र: दूसरी इबादत लैलतुल कद्र है, रमजान में एक रात ऐसी आती है जो हज़ार महीनों से बेहतर है, अल्लाह तआला का इर्शाद है, हमने इस(कुरआन) को क़द्र की रात में अवतरित किया, और तुम्हें क्या मालूम कि क़द्र की रात क्या है? क़द्र की रात उत्तम है हज़ार महीनों से, उसमें फ़रिश्तें और रूह (जिब्राइल अलैहिस्सलाम) महत्वपूर्ण मामलें में अपने रब की अनुमति से उतरते है, वह रात पूर्णतः शान्ति और सलामती है, उषाकाल के उदय होने तक(सूरह अल कद्र),
एक बार रसूलुल्लाह सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने सहाबए किराम से बनी इसराइल के कुछ लोगों की बहुत लम्बी आयु तक इबादत करने का ज़िक्र किया, तो सहाबा को ख़याल हुआ कि उनकी आयु ज़्यादा लम्बी होती थीं इसलिए उन्होंने ज़्यादा दिनों तक इबादत की, हमारी उम्रें इतनी नहीं होती हैं इसलिए हम लोग इससे वंचित हैं, तब ये सूरह नाजिल हुई और इसमें बताया गया कि इस उम्मत को ऐसी रात दी गयी है जिस में इबादत करने का सवाब आम हज़ार महीनों की इबादत से ज़्यादा है
सूरह की अंतिम आयत का अर्थ इस्लामिक विद्वानों ने यह लिखा है कि इस पूरी की पूरी रात में खैरो सलामती है यानि इस रात के जिस लम्हे में भी कोई इबादत करेगा, इंशाअल्लाह इस की फ़ज़ीलत को प्राप्त कर लेगा, यहांतक कि केवल मगरिब और ईशा की नमाज़ भी जमात से पढ़ ले, तब भी शबे क़द्र का अपना हिस्सा ज़रूर पायेगा और फिर इस रात की सलामती सुबह होने तक रहती है,
नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ईमान के साथ और अज्र व सवाब (पुण्य) की नीयत से क़द्र की रात (शबे क़द्र) को क़ियाम करने (अर्थात इबादत में बिताने) पर उभारा और बल दिया है, अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत किया है कि आप ने फरमाया : "जिस व्यक्ति ने ईमान के साथ और अज्र व सवाब की आशा रखते हुए लैलतुल क़द्र को क़ियामुल्लैल किया (अर्थात् अल्लाह की इबादत में बिताया) तो उसके पिछले गुनाह क्षमा कर दिए जायेंगे।" (सहीह बुखारी व मुस्लिम)
हजरत अनस रजियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि रमजान मुबारक के आगमन पर एक मर्तबा रसूले पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया यह जो महीना तुम पर आया है इसमें एक रात ऐसी है जो हजार महीनों से अफजल है जो जो व्यक्ति इस रात से वंचित रह गया तो गया वह सारे ही भलाई उसे वंचित रहा और इस रात की भलाई से वही व्यक्ति वंचित रह सकता है जो वास्तव में वंचित हो, (इब्ने माजह), लैलतुल क़द्र रमज़ान की आख़िरी दस दिनों की ताक़ रातों में से किसी एक रात में होती है, अतः 21, 23, 25, 27, या 29 वीं रात में इबादत करके इसे पाने का प्रयत्न करना चाहिए, इस रात में फ़रिश्ते भी आसमान से ज़मीन पर उतरते हैं और फरिश्तों के उतरने के दो मक़सद होते हैं एक ये कि इस रात में जो लोग इबादत में लगे हुए हैं तो फ़रिश्ते उनके हक में रहमत की दुआ करते हैं और दूसरा मक़सद आयते करीमा में ये बताया गया है कि अल्लाह तआला इस रात में साल भर के फैसले फरिश्तों के हवाले फरमा देते हैं, ताकि वो लोग अपने अपने वक़्त पर उन कामों को करते रहें।
अंतिम अशरे(दस दिनों) की दो महत्वपूर्ण इबादते
लेख:मो कमर अंजुम कादरी फैजी
यूं तो सारे महीने अल्लाह के हैं। और वक्त का पहिया उसके ही इशारों से चलता है। मगर जो आदर सत्कार रमज़ान के महीने को हासिल है वह आदर सम्मान किसी दूसरे महीने को नहीं मिला है।इस माह में मुसलमान अपने खुदा के लिए रोज़ा रखते हैं। ज्यादा से ज्यादा नमाज़े पढते हैं|और किताबों में रोज़े की बहुत ज्यादा फजीलत और उसके फायदे बताये गये है
दूनिया मे कोई भी मुसलमान जब कोई नेक और अच्छा काम करते हैं तो उसका सवाब बहुत ज्यादा मिलता है मगर रोज़े का सवाब खुद अल्लाह देता है।
हजरत मुहम्मद साहब ने कहा है कि ऐ लोगो तुम्हारे बीच जो महीना आया है यह वह महीना है जिसमें जो कोई नफल ईबादत के जरिए अल्लाह से नजदीकी हासिल करना चाहता है तो वह ऐसा है जैसे रमज़ान के अलावा दूसरे महीने में सत्तर 70 फर्ज अदा किये जायें. इसका मतलब यह है कि रमज़ान में एक नेकी का सवाब सत्तर 70 मिलता है जबकि और दूसरे दिनों में ऐक नेकी का सवाब ऐक ही मिलता है।
रमज़ान के महीने में किसी गरीब और मजदूर लोगों को अफतारी करवाने पर बहुत ही ज्यादा नेकीयां मिलती हैं।
अल्लाह पाक ने इसी महीने में कूराने मजीद को आसमान से धरती पर उतारा| कूरान मुसलमानों की सबसे बड़ी किताब है। जो लोगों को फायदा देती है|
ओर कोई मूसलमान रोज़े के नाम पर दिन भर सिर्फ
खाना पीना छोड दे लेकिन अपनी बूरी आदतें
न छोडे पाबंदी से नमाज न पढ़े उसका रोज़ा
रखना न रखने के बराबर है । येह लोग बेकार में
भूके - प्यासे रहते हैं । इनका रोज़ा खुदा के यहाँ
में नेकी और सवाब की किताब में जमा होने के लिए
बजाए रब् की नाफरमानी की महोर लगाकर
कचरे की पेटी में दाल दिया जायेगा।
अल्लाह का करोड़ करोड़ एह़सान हैं कि ये रमज़ानुल मुबारक हमने अपनी ज़िन्दगी में पाया! भले ही इस बार के रोज़े बहुत शदीद गर्मी में आए हैं मगर इस गर्मी से ड़रकर रोज़े मत छोड़ देना, क्या पता अगला रमज़ान नसीब होगा भी या नही?
और ये ख़याल मत करना कि 'इस साल गर्मी ज़्यादा हैं मगर अगली साल रोज़े ज़रूर रखेंगे' हां, अगर ज़िन्दगी बाक़ी रही तो ज़रूर रखेंगे लेकिन ज़िन्दगी का कोई भरोसा नही कि अगले माहे रमज़ान तक हम ज़िन्दा रहे!
इसलिए ये ख़याल करो कि इस बार गर्मी ज़्यादा है तो क्या हुआ मेरा रब मुझे सवाब भी बहुत ज्यादा देगा।
अल्लाह के जो नेक बन्दे होते हैं वो ये जानते हैं कि क़यामत की गरमी के आगे दुनिया की गरमी कुछ भी नही और वो अपने रब को राज़ी करने के लिए मुश्किल से मुश्किल नेकी भी कभी नही छोड़ते!
इस लिए हमें माहे रमज़ानुल मुबारक का आदर और सम्मान करते रहना चाहिए।
रमज़ान साल भर में एक बार आता है
Sunday, May 3, 2020
ज़फर अहमद खान
छिबरा, धर्मसिंहवा बाजार, सन्त कबीर नगर, उ.प्र.
भारत में मुस्लिमों पर बढ़ते दमन और हिंसा, घृणा, और सरकार द्वारा दोहरा मानक अपनाए जाने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताएं जारी है, और देश की छवि खराब हो रही है, पहले खाड़ी देशों और अब वैश्विक स्तर पर धार्मिक स्वतंत्रता पर नजर रखने वाला अमेरिकी आयोग यूनाइटेड कमीशन आन इन्टरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) ने विदेश विभाग से चौदह देशों सहित, भारत, को 'विशेष चिंता का देश' के रूप में दर्ज करने के लिए कहा है और आरोप लगाया है कि इन देशों में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं, अमेरिकी आयोग की घोषणा के अनुसार 2019 की रिपोर्ट में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के मानचित्र में तेजी से नीचे आया, रिपोर्ट में नागरिकता संशोधन कानून पर तीव्र आलोचना की है, रिपोर्ट कह रही है कि 2019 में भारत में अल्पसंख्यकों पर हमलों में वृद्धि हुई, रिपोर्ट में बाबरी मस्जिद से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की भी आलोचना की गई है , और इस के साथ-साथ कश्मीर की विशेष स्थिति को रद्द करने तथा उस की स्वायत्तता को समाप्त करने के लिए भारत की गंभीर आलोचना की है, और अगर ट्रम्प सरकार ने आयोग की सिफारिशों को मान्यता दी सरकार के लिए कई प्रकार की कठिनाइयां खड़का हो सकती हैं, और देश के खिलाफ कई तरह के प्रतिबंध लागू किये जा सकते है, यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिष्ठा क्षतिग्रस्त होने का डर है।
विशेष चिंता वाले देशों की सूची में भारत का नाम डालने के संयुक्त राज्य अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की सिफारिश को भारत सरकार ने खारिज करते हुए कमीशन के बयान को , तटस्थ एवं गैर-पारदर्शी करार दिया है, हालांकि सरकार तथ्यों को छुपा नहीं सकती, वैश्विक समाचार एजेंसियों द्वारा सामने आने वाले वीडियो दृश्यों से यह स्पष्ट है कि मुसलमानों पर जबरन के बल पर दमन किया गया है । आयोग की सिफारिशों पर सरकार की यह प्रतिक्रिया अप्रत्याशित नहीं है, सार्वजनिक रूप से वे इसे स्वीकार नहीं कर सकती , क्योंकि यह सिफारिशें उस के खिलाफ हैं, उन्हें वहीं इस से सरकार और देश दोनों की छवि खराब होने का डर है , हालांकि उसी अमेरिका की टाइम पत्रिका ने वर्ष 2016 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए पर्सन आफ द ईयर की घोषणा की थी, वह पहले स्थान पर थे जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा दूसरे नंबर पर थे, दूसरा, उस समय बहुत खुश और उत्साहित नज़र आ रहे थे और मोदी को पूरी दुनिया वैश्विक नेता के रूप में में, जबकि भारत को विश्वगुरु के रूप में प्रस्तुत करते नहीं थकते थे, लेकिन उसी पत्रिका ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को "इन्डियाज डिवाइडर -इन-चीफ" अर्थात् भारत को विभाजित करने वाला व्यक्ति घोषित किया तो सरकार ने इस लेख के लेखक आतिश तासीर की प्रभावशीलता के रूप में 'प्रवासी भारतीय' नागरिकता रद्द कर दिया था।
सरकार ने कमीशन की सिफारिशों को मानने से इनकार करते हुए गैर पारदर्शी करार तो दे दिया, लेकिन क्या यह सत्य नहीं है कि बीते दिनों देश में मॉब लिंचिंग के सबसे ज्यादा शिकार मुसलमान ही हुए हैं, कहीं गौ रक्षा के नाम पर तो कहीं हिंदुत्व की रक्षा के नाम पर, कहीं बच्चा चोरी के नाम पर तो कहीं लव जिहाद के नाम पर इससे पीड़ित हुए हैं, ऐसा नहीं है कि केवल मुसलमान ही इस मामले का शिकार हुए हैं बल्कि इसके अतिरिक्त यहां के दूसरे नागरिक भी इसका शिकार हुए हैं, परंतु सत्य यही है कि मुसलमानों की एक बड़ी संख्या इसका शिकार हुई है, अभी जल्द ही की बात है दिल्ली के मदन मोहन मालवीय अस्पताल ने कुछ मुस्लिम महिलाओं का उपचार करने से यह कहकर इंकार कर दिया कि तुम मुसलमान हो जमात में जाते हो इसलिए हम तुम्हारा इलाज नहीं करेंगे, मिल्लत टाइम के अनुसार यह मामला बीते एक सप्ताह पूर्व दिल्ली के सरकारी अस्पताल मदन मोहन मालवीय में पेश आया है, खानपुर की रहने वाली जैनब ने मिल्लत टाइम से फोन पर बात करते हुए कहा कि मदन मोहन मालवीय अस्पताल में मेरा इलाज चल रहा है, मैं गर्भवती हूं और हर तीन सप्ताह पर बुलाया जाता, है बृहस्पतिवार 15 अप्रैल को मैं वहां गई, रिसेप्शन से मेरी पर्ची भी कट गई और मैं लाइन में लग, गई नंबर आने के बाद जब मैं डॉक्टर के चेंबर में गई तू वहां एक लेडी डॉक्टर थी और मैंने बुर्का पहन रखा था, डॉक्टर ने मुझे देखते ही कहा वही रुक जाओ तुम लोग जमात में जाते हो और करोना फैलाते, हो मैंने कहा कि मैं जमात में नहीं जाती हूं और ना मेरे घर में कोई जाता है, डॉक्टर ने कहा तुम लोग जाओ तुम्हारा इलाज नहीं होगा हम तुम्हें नहीं देखेंगे, जैनब ने बताया कि उसने डॉक्टर से निवेदन किया कि कम से कम दवा लिख दीजिए, लेकिन इससे भी इंकार कर दिया, जैनब के अनुसार वहां और भी कई मुस्लिम महिलाएं थीं जिनका इलाज करने से डॉक्टर ने यही सब कहते हुए साफ इनकार कर दिया।
देवरिया के बरहज विधानसभा क्षेत्र से विधायक सुरेश तिवारी की इस बात से कौन ना वाकिफ है जो सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में सुना जा रहा है, जिसमें वह कुछ सरकारी अधिकारियों के साथ अन्य कुछ लोगों से कह रहे हैं एक बात ध्यान से सुनो और दिमाग में बिठा लो, मैं सभी लोग को खुले तौर पर बता रहा हूं कोई भी मुसलमानों से सब्जियां ना खरीदें, एवं बीजेपी के एक दूसरे विधायक द्वारा गली मोहल्लों से मुस्लिम सब्जी बेचने वालों को भगाने और धमकी देने का मामला किसी से छुपा नहीं है, ज्ञात हो कि लखनऊ के गोमती नगर में अपने आवासीय कॉलोनी में ठेले पर सब्जी तरकारी बेचने वाले व्यक्ति से महोबा जिले के चरखारी विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी के विधायक बृजभूषण और सोसाइटी के अन्य व्यक्ति नाम पूछते हैं, डरे हुए सब्जी विक्रेता द्वारा अपना नाम राजकुमार बताने पर उस पर झूठ बोलने का इल्जाम लगाते हैं उसे मारने पीटने और सोसाइटी से बाहर निकालने की धमकी देते हैं, अपनी इस हरकत को सही ठहराते हुए बीजेपी लीडर राजपूत ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि सब्जी विक्रेता मुसलमान था मगर हिंदू बनकर सब्जी बेच रहा था, इससे पहले हरियाणा के कैथल विधानसभा से बीजेपी विधायक लीलाराम गुर्जर ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था, "आज यह जवाहरलाल नेहरू का हिंदुस्तान नहीं आज यह गांधी वाला हिंदुस्तान नहीं अब यह हिंदुस्तान नरेंद्र मोदी जी का है अगर इशारा हो गया ना एक घंटे में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों का सफाया कर देंगे"।
दिल्ली चुनाव के दौरान मोदी सरकार में मंत्री अनुराग ठाकुर ने तो इशारों इशारों में गद्दार बताकर गोली मारने के नारे भी लगवाए, और दिल्ली से बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा ने तो और आगे जाकर यहां तक कह दिया कि शाहीन बाग के लोग दिल्ली में लोगों के घरों में घुसकर रेप करेंगे, उनसे बचना है तो बीजेपी को वोट करो, इसके अतिरिक्त उन्होंने सरकारी भूमि पर बनी समस्त मसाजिद को तोड़ने का ऐलान भी कर दिया, वोटों के पोलराइजेशन में सबसे आगे रहने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने अपना पुराना राग अलापते हुए कहा कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तो शाहीन बाग वालों को बिरयानी खिला रही हैं, मगर हम पहले बोली से समझाते हैं और नहीं माने तो फिर उनको हमारी पुलिस गोली से समझाती है, कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी के नेता और विधायक रेणुकाचार्य ने नागरिकता संशोधन कानून के समर्थन में बुलाई गई रैली में संबोधित करते हुए कहा था वह लोग मस्जिद में नमाज पढ़ने की जगह हथियार इकट्ठा करने का काम करते, हैं यहां कुछ गद्दारे वतन है, तुम लोग मस्जिद में बैठते हो और फतवे लिखते हो, मस्जिद में क्या है? वहां पर हथियार इकट्ठा किए जाते हैं क्या इसलिए मस्जिद चाहते हो? अगर तुम्हें ऐसा ही करना है तो ठीक है मैं अपनी राजनीति करता रहूंगा, यह भी कहा कि मैं मुसलमानों के लिए दिए गए बजट का हिंदुओं के काम के लिए खर्च करने से बिल्कुल नहीं पीछे हटूगा, उप्रयुक और इस प्रकार की अन्य घटनाओं में उचित कार्रवाई न करने और निष्पक्षता से काम न लेने के कारण जहां देश में स्थिति तेजी से खराब हो रही है वहाँ ऎसा करने वालों का हौसला भी बढ़ रहा है , और यह समझ से ऊपर है कि उन में इस तरह की घृणा कहाँ से आती है, और इस तरह की घृणा फैलाने के लिए उन्हें बल कहां से मिलता है, जाहिर है कि उनकी पीठ थपथपा ने वाले अवश्य कोई न कोई तत्व है, तो क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज बुलंद होने के पश्चात भी उन्हें देश की बदनामी का कोई डर नहीं रहा? क्या उनके दिलों में इस बात का एहसास भी नहीं रहा कि इस तरह की घटनाओं से हमारे देश की छवि विश्व स्तर खराब हो रही है?।
अब अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी साहब क्या यह बताने की कृपा करेंगे कि मुसलमानों के लिए कौन सा भारत स्वर्ग के समान है जहां उनके अधिकार सुरक्षित हैं, और सेक्युलरिज्म और भाईचारा किस भारत और कौन से भारतीय नागरिकों के लिए (पॉलिटिकल फैशन) राजनीतिक फैशन नहीं बल्कि परफेक्ट फैशन (जुनून) है, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओआईसी और खाड़ी देशों के कुछ विद्वानों और पत्रकारों द्वारा देश में इस्लामोफोबिया और मुस्लिम विरोधी माहौल पर गहरी चिंता जताने के बाद ट्विटर पर अपने एक संदेश में बिल्कुल सही कहा था, कोविड-19 किसी पर हमला करते वक्त उसकी नस्ल धर्म रंग जात भाषा और उसकी सीमा नहीं देखता, लेकिन क्या यह सत्य नहीं है कि देश के सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी की ओर से मुस्लिम विरोधी प्रोपैगेडो की सराहना और टीवी चैनल द्वारा उसे अधिक बल एवं सपोर्ट दिए जाने के आंदोलन ने देश की जनता के बीच खाई को और अधिक बढ़ाने तथा मुल्क की छवि खराब करने का काम नहीं किया है? क्या देश में इस तरह का वातावरण नहीं बनाया गया कि करोना केवल मुसलमानों के कारण फैल रहा है? क्या राजनीतिक नेताओं और अन्य चैनल्स ने ऐसा वातावरण नहीं बनाया कि मुसलमानों का इस वायरस को फैलाने का कारण हिंदुओं को मारना है? सोशल मीडिया पर मुस्लिम विरोधी पोस्ट लगाकर उनके दिलों में मुसलमानों के खिलाफ जहर घोलने वाले क्या देश की छवि खराब करने के जिम्मेदार नहीं हैं? क्या कोरोना के बहाने मुसलमानों को जेलों और कुरनटाइन केंद्रों में स्थानांतरित नहीं किया जा रहा है? क्या पुलिस जबरदस्ती कोरोनावायरस का रोगी बनाकर जेलों में नहीं ले जा रही है, सूचना एवं प्रसारण संस्थाओं ने तबलीगी जमात व अन्य मुसलमानों पर कोरोना जेहाद का इल्जाम नहीं लगाया? क्या मीडिया और सोशल मीडिया पर नकारात्मक एजेंडे के ध्वज धारकों ने नहीं कहा था कि नई दिल्ली में निजामुद्दीन के इलाके में स्थित तबलिगही जमात के मरकज में मुसलमान देश में करोना फैलाने की साजिश के अन्तर्गत इकट्ठा हुए थे, क्या यह किसी से छुपा है कि लाकडाउन की अवहेलना करने का जिम्मेदार तबलीगी जमात को ठहराया जा रहा है? और यह कौन नहीं जानता कि स्वयं सरकार, राजनीतिक दलों एवं अन्य धार्मिक संगठनों की ओर से लाकडाउन और कोरोना वायरस से संबंधित कानूनों का उल्लंघन किया गया है? क्या कुछ स्थानों पर दिहाड़ी मजदूरों में खाने-पीने की वस्तुएं वितरण करने वाले मुसलमानों पर हमले नहीं किए गए? कोरोना जैसी महामारी के दौरान भी शांतिपूर्ण CAA/NRC के धरनो के अंतर अंतर्गत विगत चंद दिनों में दिल्ली में सैकड़ों नौजवानों विधार्थी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी ओं को क्या दुनिया ने नहीं देखा।
उपर्युक्त घटनाओं लोगों और नेताओं की कथन को चिन्हित किए जाने के बाद यह बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि विश्व में भारत की छवि खराब करने और उसकी साख को गिराने का जिम्मेदार कौन है, अतः सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों और नेताओं के नफरत फैलाने पर केवल ट्वीट का लाली पाप न देकर उनके विरुद्ध कडी एवं त्वरित कार्रवाई की जाए, ताकि देश में अमन व शांति का वातावरण स्थापित हो सके, एवं समस्त भारतीय नागरिक शांति से जी सकें, और हमारे प्रधानमंत्री वास्तव में एक विश्व नेता बनकर सामने आए, तथा सचमुच हिंदुस्तान विश्व गुरु बन सके।
देश की छवि कौन खराब कर रहा है
Saturday, May 2, 2020
रमजान उल मुबारक सब्र का महिना है और सब्र का सिला जनतंत्र है। यह पवित्र महीना जिसकी अजमत का अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। इस मुकद्दस माह में दान करने भूखे को खाना खिलाने रोजेदार को इफतार कराने से सवाब मिलता है। रमजान उल मुबारक को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला अशरा रहमत का है। पैगम्बरे इस्लाम ने कहा है कि अगर लोगों को रमजान की अहमियत व फजीलत का पता चल जाये तो सब लोग यही तमन्ना करें कि काश पुरा साल रमजान हो जाये। रमजान उल मुबारक स्वागत के लिये पुरे साल जनतंत्र को सजाया जाता है। पैगम्बरे इस्लाम ने कहा है कि इस माह में भूखे को खाना खिलायेगा या रोजेदार को इफतार करायेगा तो उसको जमीन भर सोना दान करने का सवाब मेलेगा।रोजादारों को कभी ज़ह्नम की आग ना जला सकेगी। सब से खास बात यह है कि रमजान एक भट्टि तरह है जिस प्रकार भट्टि गंदे लोहे साफ कर मशीन का पुर्जा बना देती है सोने को तपा कर आभुषण बना कर उपयोग के लायक बना देता है। उसी तरह रमजान भी बनादों को गुनाहों से पाक साफ करके जिन्दगी जिने के लाएक बना देता है
लाक टाउन में अपने आस पास के लोगों का खयाल कयना भी सब मुसलमानों की जीम्दारी है। रमजान उल मुबारक में दान करना बहूत अजर का हामील है। दान अल्लाह के गुस्सा को टनंटा करता है। अपनी खुशियों मे से थोड़ी खुशियां गरीब लोगों में बांट दें और उस रमजान में अल्लाह तआला की बे शुमार बरकतैं अपने आमाल नामें में दर्ज करायं
रमज़ान मे करने के काम
Monday, April 27, 2020
By: Mohammed Nadeemuddin Qasmi
Madrasas are the strong protection, publication and Preachers of islam and it's soldiers and selfless servants are being prepared by them.In which,the teachings of Allah and His Messenger are taught at all the times and ulamas are prepared who protect the iman and beliefs of the people and history also testifies that whenever a storm broke out against Islam, it was the graduates of the madrassas and religious universities who resisted this poisonous wind and led the Muhammadan Ummah to the path of reality of Islam. The big poet allama IQBAL (RH) said:If there were no madrasas in India, the situation of Indian Muslims would be similar to that of Andalusia That there is no sign of Islamic civilization except buildings,Similarly, in India except the Red Fort and the Taj Mahal there will be no sign of Islam.That is why we need to help Madarsa with our lives and property.But unfortunately ,some people criticize it and call them centres of charity and the Centers of depriving the poor,Due to which a wrong impression is being created on the people,And day by day, madrassas are facing financial difficulties,So now it is our responsibility to support them in any way we can,Especially in this difficult time when everyone is upset by this virus, So we should think and imagine! How the madrasas authorities and directors will manage the accommodation and food for thousands of students.Do they have Qaron's treasure or property?No way!These madrassas are supported every year only by our Zakat and donations.But now there is question "how to cooperate them and donate in lockdown"?
There are some solutions
1..It is obligatory on wealthy people that they save their zatat and donate after lockdown, or transfer to the bank accounts of madrasas .
2..It is the responsibility of madrasas' officials and workers to contact and encourage their donors on their donations.
3..It is the responsibility of the middle class to donate as much as they can.
4.. It is responsibility of madaras's directors and workers to turn to Allah and make dua as much as they can.
Allah save our madrasas .... Aameen!
MADARIS ARE ISLAMIC CENTRES , THEIR PROTECTION IS OUR RESPONSIBILITY.
लेख:आसिम ताहिर आज़मी
अल्लाह ने अपनी शरीअत में रहस्य, आदेशों में हिकमतें और ख़िलक़त में कुछ न कुछ मक़ासिद छिपा रखे हैं, कुछ रहस्य व हिकमत और मक़ासिद तो ऐसे होते हैं, की इंसानी ज़ेहन और अक्ल उनको समझ लेते हैं और कुछ ऐसे होते हैं जहाँ इंसानी दिमाग़ आजिज़ व दर्मान्दाह हो जाते हैं । अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने रोज़ह की कुछ हिकमतें बयांन की हैं, इरशाद है :
’’یَا أَیُّہَا الَّذِیْنَ آمَنُوْا کُتِبَ عَلَیْکُمُ الصِّیَامُ کَمَا کُتِبَ عَلَی الَّذِیْنَ مِنْ قَبْلِکُمْ لَعَلَّکُمْ تَتَّقُوْن‘‘۔
(सूरे बक़रह : १८३ )
तर्जमा :ऐ इमान वालो ! तुम पर रोज़ह फ़र्ज़ किया गया है , जिस तरह तुम से पहले लोगों पर फ़र्ज़ किया गया था , इस उम्मीद पर की तुम मुत्तक़ी बन जाओ।
मालूम हुआ की रोज़ह तक़वा का एक ज़रीया है , और रोज़ह दार अपने मालिक से बाहुत करीब होता है , रोज़ह दार का पेट चूँकि खली होता है, इस लिए उसका दिल पाकीज़ह हो जाता है। उसका जिगर चूँकि प्यासा होता है इस लिए उसकी आँख में आंसू होते हैं। सही हदीस में है। इरशाद नबवी है:
तरजमा: ए नौजवानों की जमात ! तुम में से जो शख्स निकाह की ताक़त रखे वह निकाह कर ले क्यूंकि निकाह निगाह को नीचे करती है। शर्म गाह की हिफाज़त करती है। और जो शख्स निकाह की ताक़त न रखे उसको रोज़ा रखना चाहिए। क्यूंकि रोज़ा शहवत को ख़त्म करता है.
रोज़ा,खाने और खून की जगहों में तंग कर देता है। चूँकि उन जगहों में शैतान रहता है। चुनांचह रोज़ह की वजह से बुरी सोच में कमी आ जाती है ।
रोज़ा- शहवत और बुराई के अंदेशों पर रोक लाग कर रूह को मुनव्वर और रोशन करता है।
रोज़ह एक रोज़ह दार को भूके , मुहताज और गरीब रोज़ह दरों की याद दिलाता है। इसलिए वह उन पर रहम व करम करता है और उनके साथ मदद का हाथ बढ़ाता है। शायर कहता है :
तर्जमा : ऐ रोज़ह दार , तूने सिर्फ अल्लाह के खौफ में खाना छोड़कर भूक और प्यास की दोस्ती अपनाई क़यामत के दिन तेरे लिए रहमत की खुशखबरी है। तु नेकियों और नेमतों में खड़ा होगा।
रोज़ह नफ़्स की तरबियत, दिल की सफाई , निगाहों और आज़ा ( हाथ, पैर , मुंह , नाक , कांन , आँख वगैरह ) की
हिफाज़त के लिए एक बेहतरीन मदरसा के जैसा है।
रोज़ह बन्दे और ईश्वर के बीच एक राज़ है। इसलिए हदीस क़ुदसी है : अल्लाह अज़ व जल (सर्वशक्तिमान ईश्वर) का फरमान है : इंसान का हर अमल उसके लिए है , रोज़ह के इलावा, क्यूंकि रोज़ह मेरे लिए है और मैं ही उसका इनाम दूंगा।
और ऐसा इसलिए की रोज़ह एक ऐसा अमल है जिस को सिर्फ अल्लाह ही जानते हैं, जबकी नमाज़ , ज़कात और हज का मामला ऐसा नहीं है।
सल्फ़े सलिहीन( पूर्वजों ) , रोज़ह को अल्लाह से करीब करने, हर खैर की तरफ आगे बढ़ने का मैदान और तमाम भलाइयों का मौसम समझते थे। यही वजह है की रोज़े के इस्तेकबाल में खुशी की वजह से और रोज़े की जुदाई में रो पड़ते थे।
सल्फ़े सालिहीन (पूर्व धार्मिक गुरु) को रोज़े से हद दर्जा लगाओ था , इसी लिए वह रमज़ान में खूब मुजाहदह (संघर्ष ) अपने पूरे जी जान से उस में लग जाते। पूरी पूरी रात सजदह व रोने और खुशु खुज़ु में गुज़ार देते और दिन के ओकात में ज़िक्रो तिलावत , तालीम व दावत और नसीहत में मशगूल रहते।
सल्फ़े सालिहीन (पूर्व धार्मिक गुरु) रोज़े को आँखों की ठंडक दिल का सुकून और फितरी इत्मीनान का ज़रिया समझते। इस लिए वह रोज़े के मक़ासिद को सामने रख कर अपनी रूहों की तरबियत करते। उसकी तालीमात की रोश्नी में अपने दिलों को साफ करते और उसकी हिकमतों को सामने रखते हुए अपने नफ़्स को सवारने का फ़रीज़ा अंजाम देते।
सल्फ़े सालिहीन (पूर्व धार्मिक गुरु) के सही हालात में लिखा है की वह मस्जिदों में अपने अपने क़ुरानी नुस्खे ले कर बैठ जाते तिलावत करते जाते और रोते रहते,इस तरह उनकी ज़बानें और निगाहें हराम से महफूज़ भी हो जातीं।
तमाम रोज़े दार , मुसलमानो के लिए इत्तेहाद का मज़हर होते हैं। एक ही ज़माने में रोज़ह रखते हैं , एक ही वक़्त में इफ्तार करते हैं। एक ही साथ भूके होते है और एक ही साथ खाते भी हैं। यह सब उल्फत व मोहब्बत , भाई चारगी और वफादारी ही तो है। रोज़ह गलतियों को मिटाने वाला और बुराइयों को ख़तम करने वाला है, हदीस शरीफ में है। इरशादे नबवी है :
तर्जमा : एक जुमा दूसरे जुमा तक। एक उमरह दुसरे उमरह तक और एक रमज़ान दुसरे रमज़ान तक के तमाम गुनाहों को मिटा देता है , इस शर्त के साथ की कोई कबीरह गुनाह न किया जाए।
रोज़ह जिस्म को सेहत बख्शता है , गन्दगी को निकाल देता है , पेट को सुकून पहुँचाता है। खून को साफ़ करता है। दिल की हरकत मोतदिल (बराबर) करता है। रूह को इत्मीनान देता है। दिल को साफ़ सुथरा बनाता है। और अख़लाक़ को संवारता भी है।
रोज़ह दार जब रोज़े से होता है तो उसकी आत्मा में भक्ति उत्पन्न होती है। आत्मा में तवाज़ू आता है। इच्छाएं कम हो जाती हैं। इस वजह से उसकी प्रार्थना स्वीकार होती है। क्यूंकि रोज़ह दार को अल्लाह का क़ुरब नसीब हो जाता है। रोज़े की एक बहुत बड़ी हिकमत है। और वह अल्लाह की प्रार्थना का है। उसके आदेशों का पालन करना , और उसकी शरीयत के सामने सरे तस्लीम ख़म करना है। और सिर्फ रब की रज़ा हासिल करने के लिए खाने पीने की लज़्ज़त को छोड़ देना है।
रोज़े के ज़रिये एक मुसलमान अपनी इच्छााओं को पराजित करता है और खुद अपनी आत्मा पर काबू पता है , गोया रोज़ह आधे सब्र का नाम है। और अगर कोई शख्स बिला उज़्र शरई रोज़ह रखने से माज़ूर है तो वह कभी भी अपने आत्मा और ईच्छाओं पर काबू नहीं पा सकता है। रोज़े के ज़रिये नफ़्स एक ज़बरदस्त तजरुबा से गुज़रता है ,इस लिए जिहाद ,क़ुरबानी और अज़ीम कामों को अंजाम देने और हर आने वाली परेशानियों और मुशक़्क़तों को बर्दाश्त करने के लिए पूरे तौर पर तैयार हो जाता है ,यही वजह है की जब तालूत ने अपने दुश्मनों से जंग करना चाहा तो अल्लाह ने तालूत की क़ौम को नहर के ज़रिये आज़माया और तालूत ने उनसे कह दिया जैसा की क़ुरान कहता है :
’’فَمَنْ شَرِبَ مِنْہُ فَلَیْسَ مِنِّي وَمَنْ لَمْ یَطْعَمْہُ فَإِنَّہُ مِنِّی إِلاَّ مَنِ اغْتَرَفَ غُرْفَۃً بِیَدِہ‘‘۔
(सूरह बक़रह : २४९ )
तर्जमा : जो शख्स उस से पानी पीवे गा वह मेरे साथियों में से नहीं। और जो उसको ज़बान पर भी न रखे वह मेरे साथियों में से है;लेकिन जो शख्स अपने हाथ से एक चुल्लू भर ले।
(बयानुल क़ुरान : जिल्द १ पेज १६९ )
बस क्या था ! सब्र करने वाले और अपनी ख्वाहिशात पर ग़ालिब आने वाले कामियाब हो गए और अपनी फ़ितरतो और तबीयतों के ज़ोर के नीचे दब जाने वाले , ख्वाहिशात की गुलामी करने वाले जिहाद से पीछे हट गए।
रोज़े के फर्ज़ होने की हिकमतें बतौर खुलासा नीचे पेश की जाती हैं। ↴
रोज़े से अल्लाह का तक़वा नसीब होता है।
ख्वाहिशात पर ग़लबा नसीब होता है और नफ़्स काबू में आ जाता है।
एक मुसलमान ,मुसलमान होने की वजह से क़ुरबानी देने के वक़्त पर तैयार रहता है।
बॉडी पार्ट सब कण्ट्रोल में आ जाते हैं।
ख्वाहिशात पर सख्त ज़र्ब लगती है।
जिस्म को सेहत नसीब होती है।
गुनाह ख़तम होते हैं।
उल्फत , मोहबबत ,भाई चारगी, भूकों की भूक और ज़रुरत मंदों की जरूरत का एहसास होता है।
अल्लाह बेहतर जनता है :
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अरबी किताब : रोज़े दारों के ३० सबक
लेखक : शेख आईज़ अल-क़रनी
उर्दू अनुवाद : वसीउल्लाह सिद्धार्थ नगरी
हिंदी: हामिद अख्तर
रोजा और पवित्र पैगंबर का मामूल
Tuesday, April 21, 2020
BY :MOHAMMED NADEEMUDDIN QASMI
8497945720.
Ramadan is going to start after a few days,What is Ramazan?
it is a ninth month of Islamic calender ,it is month of barakah ,it is a tome of joyous growth, it is time for worship and soul purification, it is time to come closer to Allah,The prophet Mohammed (peace and blessings be upon him)says :
"اذا جاءرمضان فتحت ابواب الجنۃ وغلقت ابواب النار وصفدت الشیاطین "
Translation:where there comes the month of Ramazan, The doors of mercy (jannah)open , and hellfire is closed, the devils are chained up in it(Muslim)
There is first ten days for rahmah,the second ten days for maghfirat ,and the last ten days are to free from hellfire, in it ,the reward of nafils equal to farz,and farz is equal to 70faraiz in reward.Hazrat Aysha(RZ) Says
"کان النبی ﷺاذا داخل العشر شد مئزرہ واحیا لیلہ وایقظ اھلہ "
Translation:when the Ramazan entered The prophet Mohammed (peace and blessings be upon him)used to tight his pant, lived his night and awake his family.
Now ,Ramazan is upon us once again, But our mosques have been closed because of the virus,But the door of God is open so there is no need to be disappointed, there is question "HOW WE SPEND THIS RAMAZAN "There are some tips to do in it.
1.FASTING
It is the fifth pillar of islam ,and it is obligatory on who is an adult. In hadith ,The prophet Mohammed (peace and blessings be upon him)said:fasting will say in the day of judgment, O,Allah i prevented him form food and desires during the day, so accept my intercession for him,and the Qur'an will say O,my lord,I prevented him from sleeping by night ,so accept my intercession for him, the intercessions of both will be accepted (AHMAD)
ALLAH almighty says ,"The sawm (roza)is for me ,i shall reward it as i like.
In essence, there are many prophet 's sayings about it.
Inspite of that ,some people don't fast and say "we can't fast because of the summer and heat while they may sit inside air conditioned office and homes, and still complain.They should imagine the prophet and his companions, how they fasted? In additional ,he used to meet people and counselled them "How they spend Ramazan?, not only that,but he also participated jihad while fasting ,the battle of BADR and TABOK were fought during this blessed month of Ramazan in the scorching heat of Arab.
2.. RELATION AN RECITATION OF QURAN
The companions of our prophet Mohammed (may Allah peace and blessings be upon him) used to give special preference to the Quran during the holy month of ramazan, their recitation was not only reading verses but contemplating in its meanings.
Therefore, sufyan saury used to leave all acts of worship and turn to Quran,
Said ibn jubair used to finish the whole recitation of Quran in two nights,
Abo hanifa used to complete the holy Quran 61 times in a month.(Almustatraf)
Imam e shafai used to complete th Quran 60 times. (Alfatawa alhadisiya)
Shaik ul hadith hazrat zakariya used to recite the 30 verses in every day.(aap beti)
There ara many examples of our elders How was their Ramazan?and how was our Ramazan?imagine!
3.offer taraweeh .it is sunnah and pray extra salah.
4.Give zakat,and increase your charity as well as, the prophet was the most generous of all people and he used to become most generous in Ramazan,
Zuhri said, it is time of feeding poor,
Ibne omer used to break his fast with poor and if a poor person came to him asking food while he was eating, he used to give him his portion.
Therefore, we should improve our charity and feed the poors,not waste our money for parties Especially at this time۔
5..Try to perform Tahajjud and ishraq and chasht.
6.Don't waste time
It is precious and blessed time ,we should give attention to worship. Some ladies spend their time to make different kinds of meals at the time of iftar,and some males take a part of it ,it is a time of dua, plz take care of this time.
7..Repent and ask Allah for forgiveness
8.in the last ten days ,perform itekaf,it is sunnah.
9.Don't use smart phones in ever time to pass time,it is also big devil,it terns attention from worship to bad habits.
10...Avoid from sins and immoral things.
JAbir bin Abdullah said"when you fast then let your eyes, ears and tongue fast from false statements and bad deeds, and be calm and don't let the day of your fasting and the day of your not fasting be the same.
Abu Huraira related that prophet Mohammed, said,many people who fast get nothing from their fast except hunger and thirsty, many people who pray at the night ,get nothing from it except wakefulness BECAUSE of their immoral act(Darami)
May Allah give us taofiq to do these things.
Aameen!
The month of Ramadan and what to do?
Written by: Mohammad Mahboob Alimi
Amardobha dist sant Kabir Nagar.
The opponents of Islam are accussing Islam from terrorist and terrorism and with lapts bad matters relating with Islam. While it's so obvious that Islam is the best, perfect, completed, unique religion.according to it's qualities and skills know by about Islam. they play the emotions of Muslims test there patiences and different tactics are being used of Islam and prophet Hazrat محمد صلی اللہ تعالٰی علیہ وسلم.
Jew and Christians pay there nefarious roles in all period.
Opponents throughly know this fact that Islam is the most important source of humen being....but his believers are able to take benefits from Islam.
Even a common Muslim bless understands to sacrifice his soul for the sake of protectiont the Holly Quran and Islam.that's reason whenever a plan was made against Islam . Muslims have shown there Passions, loves and Faith .this is strange situation Europe, America and other countries are propagating against Islam.
It's not a new matter to humiliated Islam and it's believers by yahood ,nasara and other religions.
Even today opponents of Islam are trying to stop the prophet's Islam and Quran growing popularly of Islam.
While the support of Allah is with all believers and all person, when has made conspiracy against of Islam.
The religion Islam mostly is being accepted in Europe America and other countries in comparison of other religions.the Holly Quran mostly is being read over all world and it's much readable book in world.
poisons against of Islam are being shared in Europe and America .even is scetched dirty schedule, even is attacked from all sides of islam and Muslims.
As being wronged on the siriya, Burma,filistin and other countries .and now this happening in India. How are being persecuted Muslims in India not hidden to any one ..
We should do good, avoid bads , help workers,change our characters , according to reads of Islam and be completed Muslim.
Islam and Terrorism
लेख: आसिम ताहिर आज़मी
रमजान अल्लाह की तरफ से दी गई नेमातौं में से एक है, यह संभव है कि अल्लाह हमें इस रमजान के बाद कई और रमजान दे और यह भी संभव है कि यह रमजान हमारे जीवन का अंतिम रमजान होगा,
यह रमज़ान पिछले कई रमज़ानों की तरह तो गुजर जाएगा लेकिन यह सोचने की बात है कि क्या हम ये रमज़ान अल्लाह और उसके के रसूल की आज्ञाकारिता में खर्च करेंगे।?
इस पर विचार करना और समझना अधिक महत्वपूर्ण है कि यदि हम रमजान में अल्लाह और उसके रसूल की बातों का पालन करते हैं, तो क्या हम रमजान के बाद आज्ञाकारी बने रहने की प्रतिज्ञा करते हैं?
यदि हाँ, तो यह बहुत संतुष्टिदायक बात है, और यदि नहीं, तो निश्चित रूप से ये बहुत नुकसान और सोचने वाली बात है,
रमजान का आगमन ऐसे समय में हो रहा है जब न केवल हमारा देश बल्कि पूरी दुनिया में कोरोना वायरस व्यापक रूप से फैला हुआ है हमारे देश के इलावा दुनिया के आधिक देशों में लाकडाउन लगा हुवा है। हमारे देश में भी, कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे के मद्देनजर लॉकडाउन का समय और बढ़ाया जासकता है , लेकिन ज्यादातर लोगों को इस बात का उल्लेख करते देखा गया है कि इस बार रमजान में क्या होगा। कहां और कैसे तराविह की नमाज पढ़ेगे यह सब केवल कहने का विषय है: यह इस्लाम धर्म की अच्छाई है कि समस्याओं को कठिन परिस्थितियों में नरमी दी गई है। अपने अपने घरों में नमाज तराविह के साथ-साथ कुरान की अधिक तिलावत करें सरकारी आदेश का पालन करें
लॉकडाउन में भी कई चीजें खुली हैं
सोचने से तालाबंदी का ताला खुल सकता है।
याद रखें अल्लाह जब एक दरवाजा बन्द करता है तो सौ दरवाजे खोल देता है। बेशक मुश्किल के बाद आसानी है, गम ना हो तो खुशी की कदर कौन करे, रात ना हो तो दिन का इन्तजार कौन करे, कैद और बन्दिश ना हो तो आजादी को कौन समझे, लाकडाउन जरूर है लेकिन जरा गौर से देखो हर चीज लाकडाउन नही है।
आकाश की तरफ देखो सुरज चांद सितारे लाकडाउन नही हैं
अपने अंदर मौजूद गुणों को देखें। कोई लॉकडाउन नहीं है
उन विज्ञानों को सीखने की कोशिश करें जिन्हें आप नहीं जानते हैं, कुछ नया सीखने के मार्ग पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
अपना नाम लेकर अपनी हस्ती को आवाज दो तुम्हारी आवाज में कोई रुकावट नही है रु रु कर अपने गुनाहों की तोबा करें तोबा के रास्ते में कोई रुकावट नही है कोशिश करें लाकडाउन में ही नहीं बल्कि हमेशा इन बातों पर अमल करें।
रमजान महिना अल्लाह का महीना है, जो दर्शाता है कि इस धन्य महीने का अल्लाह के साथ एक विशेष संबंध है, जो इसे एक विशिष्ट और प्रतिष्ठित महीना बनाता है।
हदीस पाक मे है कि
रमजान ऐसा महीना है जिसके पहले भाग में अल्लाह की रहमत बरसती है, मध्य भाग मगफरत, अंतिम भाग में नरक की आग से मुक्ति मिलती है।
रमजान महिना रहमतौं बरकतौं और नेमातौं वाला महिना है बस चन्द दिनों ही में आने वाला है।
रोजा रखने के बाद निहायत ही कमजोर ईमान वाले व्यक्ति का विश्वास इतना मजबूत हो जाता है कि वह रोजा की हालत में छिप कर खाना या दो तीन मिनट पहले रोजा खोलना गवारा नही कर सकता, तो आइये हम सब खुद से सवाल करें कि रोजा के इलावा दोसरे मामले में हम कियुं दिलेर होजाते हैं?।
"रोजे में हम अल्लाह के आदेश को स्वीकार करते हैं अल्लाह और उसके पैगंबर ने जो हुकम दिया है उसे तो हम वैसे ही मानते हैं ऐक मिनट की भी नाफरमानी नही करते हैं
जबकि रोजा के इलावा भी अल्लाह ने बहुत से अहकाम बतोर फर्ज आइद किये हैं
रोजा तो हम सब अहकामे इलाही मानते हैं लेकिन ___किया हाराम से बचना और हलाल कमाना अहकामे इलाही नही है? क्या हम तमाम पर नमाज बा जमात अहकामे इलाही नही है? क्या सही नेसाब के मुताबिक जकात अदा करना अहकामे इलाही नही है? क्या वालिदैन के साथ मुहब्बत व इहतिराम से पेश आना अहकामे इलाही नही है? क्या सिला रहमी अहकामे इलाही नही है?
इस के अलावा और बहुत से अहकामे इलाही हैं जिनको हमारे ऊपर फर्ज किया गया है लेकिन अफसोस की हम लोग उसे छोड़ देते हैं और इहसास तक नही होता।
आखिर में अल्लाह से प्राथना करता हूं कि इस मुबारक महिने के साथ साथ उन तमाम अहकामे इलाहिया पर जो हमारे ऊपर फर्ज हैं उन तमाम को पुरा करने वाला बनाऐ
आमीन
लॉकडाउन में रमजान का आगमन
Saturday, April 18, 2020
लेख: जैनुल आबेदीन नदवी
अनुवाद: मो साबिर हुसैन नदवी,पूर्णिया,बिहार
चारों ओर हर कोई ख़ुद को ह़क़ पसंद और सच्चाई का झंडा उठाने वाला बताने में व्यस्त है और ताज्जुब है कि ख़ुद के तय किए हुए सिद्धान्तों पर अमल करने ही को ह़क़ समझने की भूल करते हुए इसी की दावत दे रहा है, जिस को क़बूल करने वाला उस की नज़र में अहले ह़क़ और रद्द करने वाला बातिल समझा जाता है,शरीअत व त़रीक़त और दावाए ह़क़ की आड़ में मन चाही बातौं को मेअयारे ह़क़ बावर कराने का एक सिलसिला है,जिस से मुंह फेरना ,कुछ समझा दार समझे जाने वाले हज़रात की नज़रौं में गोया बहुत बड़ा गुनाह है, जबकि सच्चाई यह है कि दीन व शरीअत और नेज़ामे ह़क़ पर किसी ख़ास व्यक्ति की एजारा दारी नहीं कि वह जिसे चाहे अहले ह़क़ बताए,और जिसे चाहे उस से बाहर कर दे, बल्कि इस का एक मेयार है जिस का नाम तक़वा(अल्लाह का डर) है,इस मेअयार पर पूरा उतरने वाला ह़क़ पसंद और शरीअत की पैरवी करने वाला समझा जाएगा, चाहे वह एक चरवाहा ही कियौं न हो, और जिस की जिंदगी ज़ुहदो तक़वा से ख़ाली हों उसे अहले ह़क़ शुमार करना ह़क़ का ख़ून करने के बराबर होगा, चाहे वह साह़ेबे जुब्बा व दस्तार और एमामा व पायजामा ही कियौं न हो, और तक़वा का तराज़ू लेबास और ह़ुलया नहीं बल्कि ऐसा दिल है जो अहकामाते किताब और इत्तेबाए सुन्नत से मोज़य्यन हो,
लेकिन अफ़सोस है कि यह मेअयार लोगों की नज़रों में (नऊज़ो बिल्लाह)फ़रसूदा/पुराना हो चुका है और लोग ज़ाहरी शकलो सूरत को ही तक़वा का पैकर समझने के आदी हो चुके हैं, यही कारण है कि ह़क़ बयानी की सलाहियत ख़त्म होती जा रही है, और मिल्लत का बेड़ा डूबने के बिल्कुल क़रीब पहूंच चुका है मुसलमान अंध भक्त नहीं होता और जो अंध भक्त हो वह मुसलमान नहीं हो सकता, और अंधी अक़ीदत ने ही हमें यह दिन देखने पर मजबुर किया है,इस लिए इस मरज़/बीमारी से ख़ुद को निकालने और सह़ीह़ माना) अर्थ में इसलाम को अपनाने की कोशिश किजये.
मेअयारे ह़क़
Friday, April 17, 2020
आज दुनिया का हर व्यक्ति चाहे कीसी भी धर्म का मानने वाला हो, इस प्रश्न का उत्तर अवश्य चाहता है कि, खुदा क्या है? क्या वह मौजूद है? खैर, ये सवाल बहुत स्पष्ट है, और इसका उत्तर भी स्पष्ट है परन्तु उसे मानने का नज़रिया अलग है।
पहला सवाल यह है कि खुदा क्या है?
खुदा वह है जिसकी न प्रारम्भ है और न ही अंत, खुदा वह है जिसका कोई पिता नहीं है, कोई पुत्र नहीं है, खुदा वह है जो वह देखता तो है, लेकिन उसके पास कोई आंख नहीं है, वह सुनता तो है लेकिन उसके कान नहीं, वह हर काम करता तो परन्तु उसका कोई शरीर नही। यहाँ तक कि मनुष्य का दीमाग उसके अस्तितव की कल्पना भी नही तक सकता।
रहा यह प्रश्न कि क्या खुदा मौजूद है?
सबसे पहले, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यदि कोई व्यक्ति खुदा के अस्तित्व से इनकार करता है, तो वह किसी भी तर्क को अस्वीकार कर सकता है, जैसे कि यदि कोई यह मानने से इनकार करता है कि लोग चंद्रमा पर जा चुके हैं, तो आपको उसे कितना ही तर्क देंगे वह अस्वीकार कर देगा।
खैर, यहां कुछ तर्क हैं ।
(1) ब्रह्मांड का अस्तित्व:- खुदा के मौजूद होने का सबसे बड़ा तर्क यह है कि ब्रह्मांड का अस्तित्व है क्योंकि हम सभी जानते हैं कि एक छोटी सी चीज अपने आप अस्तित्व में नहीं आ सकती। तो इतना बड़ा ब्रह्मांड अपने आप ही कैसे अस्तित्व मे आ सकता है? पत चला कि कोई तो है जिसने इस ब्रह्मांड की रचना की है, और रचना करने वाला ही खुदा है।
(2) खुदा के अस्तित्व के लिए दूसरा महत्वपूर्ण तर्क यह है कि यह संसार बहुत ही संगठित है और हमने हमेशा देखा है कि बड़ी से बड़ी मशीनें भी बिना दिशा-निर्देश दिए स्वचालित रूप से नहीं चल सकती हैं, यहाँ तक कि डॉ० जॉन वी इटन्साँफ और क्रॉफर्ड बैरी का बनाया हुआ कंप्युटर जिसे
वैज्ञानिक आसान बनाने के लिए वर्षो से काम कर रहे हैं, फिर भी कंप्यूटर हमारे मार्गदर्शन और आदेश के बिना कुछ नहीं करता है। तो यह संसार
बिना किसी आदेश के कैसे चल सकता है? और वह भी पुर्ण अनुशासन के साथ कि हर दिन एक ही दिशा में उगता सूरज, हमेशा चंद्रमा २४ घंटे में ही अपने चक्र को पूरा करते हैं । पता चला कि कोई तो है जो पूर्ण अनुशासन के साथ इस महान ब्रह्मांड को चला रहा है, और निश्चित रूप से वही खुदा है । खुदा के अस्तित्व पर कई अन्य तर्क,वितर्क दिए जा सकते हैं। परन्तु मानने वाले के लिए यही दो काफी हैं और ना मानने वाले के लिए हज़ारो नही लाखों भी कम हैं।
पहला सवाल यह है कि खुदा क्या है?
खुदा वह है जिसकी न प्रारम्भ है और न ही अंत, खुदा वह है जिसका कोई पिता नहीं है, कोई पुत्र नहीं है, खुदा वह है जो वह देखता तो है, लेकिन उसके पास कोई आंख नहीं है, वह सुनता तो है लेकिन उसके कान नहीं, वह हर काम करता तो परन्तु उसका कोई शरीर नही। यहाँ तक कि मनुष्य का दीमाग उसके अस्तितव की कल्पना भी नही तक सकता।
रहा यह प्रश्न कि क्या खुदा मौजूद है?
सबसे पहले, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि यदि कोई व्यक्ति खुदा के अस्तित्व से इनकार करता है, तो वह किसी भी तर्क को अस्वीकार कर सकता है, जैसे कि यदि कोई यह मानने से इनकार करता है कि लोग चंद्रमा पर जा चुके हैं, तो आपको उसे कितना ही तर्क देंगे वह अस्वीकार कर देगा।
खैर, यहां कुछ तर्क हैं ।
(1) ब्रह्मांड का अस्तित्व:- खुदा के मौजूद होने का सबसे बड़ा तर्क यह है कि ब्रह्मांड का अस्तित्व है क्योंकि हम सभी जानते हैं कि एक छोटी सी चीज अपने आप अस्तित्व में नहीं आ सकती। तो इतना बड़ा ब्रह्मांड अपने आप ही कैसे अस्तित्व मे आ सकता है? पत चला कि कोई तो है जिसने इस ब्रह्मांड की रचना की है, और रचना करने वाला ही खुदा है।
(2) खुदा के अस्तित्व के लिए दूसरा महत्वपूर्ण तर्क यह है कि यह संसार बहुत ही संगठित है और हमने हमेशा देखा है कि बड़ी से बड़ी मशीनें भी बिना दिशा-निर्देश दिए स्वचालित रूप से नहीं चल सकती हैं, यहाँ तक कि डॉ० जॉन वी इटन्साँफ और क्रॉफर्ड बैरी का बनाया हुआ कंप्युटर जिसे
वैज्ञानिक आसान बनाने के लिए वर्षो से काम कर रहे हैं, फिर भी कंप्यूटर हमारे मार्गदर्शन और आदेश के बिना कुछ नहीं करता है। तो यह संसार
बिना किसी आदेश के कैसे चल सकता है? और वह भी पुर्ण अनुशासन के साथ कि हर दिन एक ही दिशा में उगता सूरज, हमेशा चंद्रमा २४ घंटे में ही अपने चक्र को पूरा करते हैं । पता चला कि कोई तो है जो पूर्ण अनुशासन के साथ इस महान ब्रह्मांड को चला रहा है, और निश्चित रूप से वही खुदा है । खुदा के अस्तित्व पर कई अन्य तर्क,वितर्क दिए जा सकते हैं। परन्तु मानने वाले के लिए यही दो काफी हैं और ना मानने वाले के लिए हज़ारो नही लाखों भी कम हैं।
खुदा क्या है ?
Thursday, April 9, 2020
By:Zafar Ahmad Khan
At :Chhibra, P. O. Dharmsinghwa Bazar , District :Sant Kabir Nagar
Dua is a form of worship, in fact our holy Prophet sallallahu alaihi wasallam regarded it as the best form of worship. The Prophet(pbuh) said, “Supplication is the essence of worship.” Then, the Prophet recited the verse, “Your Lord says: Call upon Me and I will respond to you. Verily, those who disdain My worship will enter Hell in humiliation.” (Almomin:60).
When we make dua in front of Almighty Allah for our needs and wants our dua is being answered, Allah Almighty says in the Holy Quran:“When my servants ask you concerning me, (tell them) I am indeed close (to them). I listen to the prayer of every suppliant when he calls on me.” (Albaqarah:186), and we will be rewarded for worshiping also. Through dua we accept the power and authority of Allah and our weakness in front of him.
Dua is considered very power full in Islam, as it can change our fate and it can be the most powerful weapon for a Muslim at the time of grief and sorrows. Dua is not just asking about our needs from Allah, as it is the belief of all Muslims that Allah is the sole provider and creator of everything. So through dua we also thank Allah for whatever he has given to us, weather it is our heartbeat, our breath, our health or our wealth, all of these are provided us by Allah. We also ask guidance from Allah at the time of difficulty to show us the way to face this hurdle. Allah is listening to each and every dua made in front of him and answers all the duas .
Etiquettes of Dua:
1. Faithfulness to Allah.
2. Avoiding from haraam food, clothing and earnings.
3. Making Dua with sincerity,(means that nobody but Allah Ta’ala will fulfill his objectives).
4. Performing a good deed prior to making the Dua.
5. Making Dua whilst one is pure & clean.
6. Making wudhu before Dua.
7. Facing the Qiblah direction.
8. Praising Allah at the beginning as well as at the end of Dua.
9. Reciting Durood & salam upon Prophet(pboh)at the beginning and the end.
10. Asking Allah by his name and Attributes.
11. Trusting in Allah and having certainty that it will be answered.
12. Raising both the hands up to the shoulders.
13. Presencing of the heart in dua.
14. Sitting with humility and respect.
15. Avoiding from raising the eyes towards the sky whilst making Duaa.
16. Crying with the fear of Allah while making Dua.
17. Avoiding from ceremonies rhyming of the Duaa phrases.
18. Avoiding from saying the Dua in a singing tone.
19. Making dua in a moderately low voice.
20. Making Dua in a soft voice.
21. Uttering Dua phrases transcribed from the Prophet (pbuh).
22. Not making Dua against oneself, or his family, wealth and children.
23. Making a Dua that encompasses most of the needs of Deen and the dunya.
24. Making dua for all matters.
25. Making Dua in favour of oneself first, thereafter ones parents and to include the other Muslims in Dua as well.
26. Not making dua for forbidden, prohibited and impossible things.
27. An Imam not make Dua for himself only but he should Include all the congregation in the Dua.
28. Making Dua with enthusiasm & yearning.
29. Making Dua repeatedly, (repetition should be at least thrice).
30. Avoiding from making Dua of severing family ties or other sins.
31. Avoid making Duas of pre-determined and fixed things.
32. Not making a Dua in which the person ask Allah Ta’ala to confine His mercy to himself only.
33. Asking only Allah Ta’ala alone for all needs.
34.The person making Dua and the person listening to it, both should say ‘Aameen’ at the end.
35. Rubbing both hands over the face at the termination of Dua.
36. Not being impatient over the acceptance of Duas.
37. Beseeching, humility, hope and fear.
38. Focusing with proper presence of mind.
39. Saying dua silently and not out loud.
40. Asking Allah by mentioning past good deeds we performed sincerely for him.
May Allah enable to make dua at all times, not just during times of distress, and not only for ourselves but also for our parents, brothers, sisters, spouses, children, relatives and friends, specially muslims who are struggling everywhere, Aameen.
Importance of Dua and it's etiquettes
Tuesday, April 7, 2020
शब ए बरात एक ऐसी पाकीज़ा रात है जिस मे अल्लाह की इबादत करने वाले पर अल्लाह पाक की बेशुमार रहमतें नाजि़ल होती है। इस रात गुनाहों की बख्शिस होती है, जहन्नम से निज़ात (छुटकारा) मिलता है और इसी रात बन्दों (लोगों) की पुरे साल रोज़ी लिख दी जाती है।
शब ए बरात में हमें ज्यादा से ज्यादा इबादत करके अल्लाह से हमारे गुनाहो की मुआफी मांगनी चाहिए। और अल्लाह पाक से रो-रोकर दुआ मांगनी चाहिए ! बेशक वही है रिज़्क़ देने वाला ! जिंदगी और मौत देने वाला ! और सभी की सुनने वाला है। और इस महामारी मे से निज़ात देने वाला वही है।
इस रात की नफ्ल नमाज़े और तस्बीहात के पढ़ने का तरीका
۞मगरिब की नमाज़ से पहले पढ़ें:
मगरिब की नमाज़ से पहले 40 मर्तबा
لَاحَوْلَ وَلَا قُوَّۃَ اِلَّا بِااللّٰہِ الْعَلِیِّ الْعَظِیْمِ
और सो मर्तबा दुरुद शरीफ पढ़ने की बरकत से 40 वर्ष के गुनाह माफ होते हैं और जन्नत में खिदमत के लिए 40 हूर मामूर कर दी जाती हैं (मिफताहुल जिनान)
۞मगरिब के बाद 6 रक्आत मुहताजी, आफत, और बलियात से महफूज़ रहने के लिए पढ़े।
मगरिब की नमाज के बाद 6 रकात नवाफ़िल इस तरह पढ़ें कि 2 रकात नमाज नफ्ल बारा ए दराज़ी ए उम्र बिलखैर पढ़ें फिर सुरे यासीन या सुरह अहद 21 बार पढ़ कर दुबारा दो रकात नफिल बारा ए तरक्क़ी व कुशादगी ए रिजक पढ़े फिर सुरे यासीन या सुरह अहद 21 बार पढ़ कर और 2 रकात नफिल जमीन व आसमान के मुसीबतों से महफूज़ रहने के लिए पढ़ें फिर सुरे यासीन या सुरह अहद 21 बार पढ़ कर दुआ ए शाबान पढ़ें इंशाल्लाह 1 साल तक मुहताजी, आफत, और बलियात करीब नहीं आएंगी |
۞तमाम छोटे बड़े गुनाहों की माफी
8 रकात नफिल दो-दो करके पढ़ें, हर रकात में सूरह फातिहा के बाद 25 मर्तबा सूरह इखलास पढ़ कर ख़ुलूस ए दिल से तौबा करें और इस दुआ को
اَللّٰہُمَّ اِنَّکَ عَفُوٌّ کَرِیْمٌ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّیْ یَا غَفُوْرُ یَا غَفُوْرُ یَا غَفُوْرُ یَا کَرِیْمُ
खड़े होकर, बैठ कर, और सजदे में 44 मर्तबा पढ़ें गुनाहों से ऐसे पाक हो जाएंगे जैसे कि आज ही पैदा हुए हों |
۞रिजक में बरकत और कारोबार की तरक्की के लिए:
2 रकात नमाज हर रकात में सूरह फातिहा के बाद आयतुल कुर्सी एक मर्तबा सूरह इखलास 15 मर्तबा पढ़ें | सलाम के बाद 100 मर्तबा दुरुद शरीफ पढ़ें फिर 313 बार
یَاوَھَّابُ یَا بَاسِطُ یَارَزَّاقُ یَا مَنَّانُ یَا لَطِیْفُ یَا غَنِیُّ یَا مُغْنِیُّ یَا عَزِیْزُ یَا قَادِرُ یَا مُقْتَدِرُ
पढ़ने से कारोबार में बरकत और रिजक में बढ़ोतरी हो जाती है |
۞मौत की सख्ती से आसानी और अजाबे कब्र से हिफाजत
4 रकात पढ़ें हर रकात में सूरह फातिहा के बाद सूरह तकासुर एक मर्तबा और सूरह इखलास बार पढ़कर सलाम के बाद सूरह मुल्क 21 मर्तबा और सूरह तौबा की आखिरी दो आयत है 21 बार पढ़ने से इंशाल्लाह मौत की मौत की सख्तीयों और कब्र के आजाब से महफूज रहेंगेक |
۞2 रकात नफ्ल तहियातुल वजू पढ़ें
तरकीब: हर रकात में सूरह अलहम्द के बाद एक बार आयतल कुर्सी 3 बार सूरह इखलास पढ़ें | फजीलत: हर कतरा पानी के बदले 700 रकात नफिल का सवाब मिलेगा |
2 रकात नफ्ल
हर रकात में अल हम्द के बाद एक बार आयतल कुर्सी 15 बार कुल सूरह इखलास और सलाम के बाद एक सौ बार दुरूद शरीफ पढ़ें | फजीलत: रोजी में बरकत होगी रंज व गम से निजात, गुनाहों की बख्शीश व मगफिरत होगी |
۞8 रकात दो-दो करके
तरकीब: हर रकात में सूरह अलहमद के बाद 5 बार सूरह इखलास फजीलत: गुनाहों से पाक साफ होगा दुआएं कुबूल होगी सवाब ए अज़ीम होगा
۞12 रकात दो दो करके
तरकीब: हर रकात में सूरह फातिहा के बाद 10 बार सूरह इखलास और 12 रकात पढ़ने के बाद 10 बार कलमा ए तौहीद 10 बार कलमा ए तमजीद 10 बार दुरुद शरीफ फ़ज़ीलत: तमाम नेक हाजतें पूरी होंगी
۞14 रकात दो-दो करके
तरकीब हर रकात में सूरह फातिहा के बाद जो सूरह चाहे पढ़ें फजीलत: जो भी दुआ मांगे कुबूल होगी
۞4 दो-दो करके
तरकीब: हर रकात में सुरह फातिहा के बाद 50 बार सूरह इखलास शरीफ फजीलत: गुनाहों से पाक हो जाएगा जैसे अभी मां के पेट से पैदा हुआ हो |
۞8 रकात दो दो करके
हर रकात में सूरह फातिहा के बाद 11 बार सूरह इखलास इसका सवाल खातून ए जन्नत बीबी फातिमा जहरा रजी अल्लाहा को नज्र करें फ़ज़ीलत: आप फ़रमाती हैं कि इस नमाज पढ़ने वाले की शफ़ाअत किए बिना जन्नत में कदम ना रखूंगी|
सलातुत तस्बीह का आसान तरीका
तस्बीह “सुब्हानअल्ला हि वलहम्दु लिल्ला हि वला इला ह इल्लल्ला हु वल्लाहु अकबर”
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
सबसे पहले सलातुत तस्बीह की नियत करें (चार रकअत एक सलाम से)
तर्जुमा: नीयत की मैंने 4 रकअत सलातुत तस्बीह, वास्ते अल्लाह तआला के, मुंह मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़। अल्लाहु अकबर।
फिर सना (सुब्हानाक अल्लाहुम्मा…) के बाद 15 मरतबा तस्बीह पढ़ें। फिर
आउजु बिल्ला हि मि नश्शैता निर्र जीम बिस्मिल्लाहिर र्रहमानिर्र हीम
सुरह फ़ातिहा (अल्हम्दोलिल्ला हि रब्बिल आ लमीन….) सूरे मिलाइये (कुरआन की कम से कम तीन आयतें या जो चाहें) सूरे मिलाने के बाद 10 बार
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
फिर रुकूअ् में 10 मरतबा
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
पढ़ें । फिर (रुकूअ् से खड़े होकर)
क़याम (समिअल्ला हु लेमन ह मे दह रब्बना लक लहम्द के बाद) में 10 मरतबा
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
पढ़ें। फिर सज्दे में 10 मरतबा (सुब्हान रब्बिल आला के बाद) पढ़ें।
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
फिर (सज्दे के दरमियान) जल्सा में 10 मरतबा
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
पढ़ें। फिर दूसरे सज्दे में 10 मरतबा (सुब्हान रब्बिल आला के बाद)
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
पढ़ें। फिर अगली रकअत के लिए खड़े हो जाएं। इस तरह पहली रकअत में 75 मरतबा पढ़ें, दूसरी रकअ्त में 75 मरतबा पढ़ें। यानी खड़े होते ही पहले 15 बार फिर सूरे मिलाने के बाद 10 बार फिर रुकूअ् में 10 बार फिर क़याम में 10 बार फिर सजदे में 10 बार फिर जलसा में 10 बार फिर दूसरे सजदे में 10 बार। दूसरी रकात में कअ्दा में बैठकर अत्तहियात पढ़ें और फिर तीसरी रकात के लिए खड़े हो जाएं। तीसरी रकअ्त में 75 मरतबा और चौथी रकअ्त में 75 मरतबा तस्बीह पढ़ें। चौथी रकात में कअदा में बैठकर अत्तहियात, दरूद इब्राहिम और दुआ पढ़कर नमाज़ मुकम्मल करें। इस तरह चार रकअत में कुल 300 मरतबा तस्बीह पढ़ी जाएगी।
शब ए बरात में हमें ज्यादा से ज्यादा इबादत करके अल्लाह से हमारे गुनाहो की मुआफी मांगनी चाहिए। और अल्लाह पाक से रो-रोकर दुआ मांगनी चाहिए ! बेशक वही है रिज़्क़ देने वाला ! जिंदगी और मौत देने वाला ! और सभी की सुनने वाला है। और इस महामारी मे से निज़ात देने वाला वही है।
इस रात की नफ्ल नमाज़े और तस्बीहात के पढ़ने का तरीका
۞मगरिब की नमाज़ से पहले पढ़ें:
मगरिब की नमाज़ से पहले 40 मर्तबा
لَاحَوْلَ وَلَا قُوَّۃَ اِلَّا بِااللّٰہِ الْعَلِیِّ الْعَظِیْمِ
और सो मर्तबा दुरुद शरीफ पढ़ने की बरकत से 40 वर्ष के गुनाह माफ होते हैं और जन्नत में खिदमत के लिए 40 हूर मामूर कर दी जाती हैं (मिफताहुल जिनान)
۞मगरिब के बाद 6 रक्आत मुहताजी, आफत, और बलियात से महफूज़ रहने के लिए पढ़े।
मगरिब की नमाज के बाद 6 रकात नवाफ़िल इस तरह पढ़ें कि 2 रकात नमाज नफ्ल बारा ए दराज़ी ए उम्र बिलखैर पढ़ें फिर सुरे यासीन या सुरह अहद 21 बार पढ़ कर दुबारा दो रकात नफिल बारा ए तरक्क़ी व कुशादगी ए रिजक पढ़े फिर सुरे यासीन या सुरह अहद 21 बार पढ़ कर और 2 रकात नफिल जमीन व आसमान के मुसीबतों से महफूज़ रहने के लिए पढ़ें फिर सुरे यासीन या सुरह अहद 21 बार पढ़ कर दुआ ए शाबान पढ़ें इंशाल्लाह 1 साल तक मुहताजी, आफत, और बलियात करीब नहीं आएंगी |
۞तमाम छोटे बड़े गुनाहों की माफी
8 रकात नफिल दो-दो करके पढ़ें, हर रकात में सूरह फातिहा के बाद 25 मर्तबा सूरह इखलास पढ़ कर ख़ुलूस ए दिल से तौबा करें और इस दुआ को
اَللّٰہُمَّ اِنَّکَ عَفُوٌّ کَرِیْمٌ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّیْ یَا غَفُوْرُ یَا غَفُوْرُ یَا غَفُوْرُ یَا کَرِیْمُ
खड़े होकर, बैठ कर, और सजदे में 44 मर्तबा पढ़ें गुनाहों से ऐसे पाक हो जाएंगे जैसे कि आज ही पैदा हुए हों |
۞रिजक में बरकत और कारोबार की तरक्की के लिए:
2 रकात नमाज हर रकात में सूरह फातिहा के बाद आयतुल कुर्सी एक मर्तबा सूरह इखलास 15 मर्तबा पढ़ें | सलाम के बाद 100 मर्तबा दुरुद शरीफ पढ़ें फिर 313 बार
یَاوَھَّابُ یَا بَاسِطُ یَارَزَّاقُ یَا مَنَّانُ یَا لَطِیْفُ یَا غَنِیُّ یَا مُغْنِیُّ یَا عَزِیْزُ یَا قَادِرُ یَا مُقْتَدِرُ
पढ़ने से कारोबार में बरकत और रिजक में बढ़ोतरी हो जाती है |
۞मौत की सख्ती से आसानी और अजाबे कब्र से हिफाजत
4 रकात पढ़ें हर रकात में सूरह फातिहा के बाद सूरह तकासुर एक मर्तबा और सूरह इखलास बार पढ़कर सलाम के बाद सूरह मुल्क 21 मर्तबा और सूरह तौबा की आखिरी दो आयत है 21 बार पढ़ने से इंशाल्लाह मौत की मौत की सख्तीयों और कब्र के आजाब से महफूज रहेंगेक |
۞2 रकात नफ्ल तहियातुल वजू पढ़ें
तरकीब: हर रकात में सूरह अलहम्द के बाद एक बार आयतल कुर्सी 3 बार सूरह इखलास पढ़ें | फजीलत: हर कतरा पानी के बदले 700 रकात नफिल का सवाब मिलेगा |
2 रकात नफ्ल
हर रकात में अल हम्द के बाद एक बार आयतल कुर्सी 15 बार कुल सूरह इखलास और सलाम के बाद एक सौ बार दुरूद शरीफ पढ़ें | फजीलत: रोजी में बरकत होगी रंज व गम से निजात, गुनाहों की बख्शीश व मगफिरत होगी |
۞8 रकात दो-दो करके
तरकीब: हर रकात में सूरह अलहमद के बाद 5 बार सूरह इखलास फजीलत: गुनाहों से पाक साफ होगा दुआएं कुबूल होगी सवाब ए अज़ीम होगा
۞12 रकात दो दो करके
तरकीब: हर रकात में सूरह फातिहा के बाद 10 बार सूरह इखलास और 12 रकात पढ़ने के बाद 10 बार कलमा ए तौहीद 10 बार कलमा ए तमजीद 10 बार दुरुद शरीफ फ़ज़ीलत: तमाम नेक हाजतें पूरी होंगी
۞14 रकात दो-दो करके
तरकीब हर रकात में सूरह फातिहा के बाद जो सूरह चाहे पढ़ें फजीलत: जो भी दुआ मांगे कुबूल होगी
۞4 दो-दो करके
तरकीब: हर रकात में सुरह फातिहा के बाद 50 बार सूरह इखलास शरीफ फजीलत: गुनाहों से पाक हो जाएगा जैसे अभी मां के पेट से पैदा हुआ हो |
۞8 रकात दो दो करके
हर रकात में सूरह फातिहा के बाद 11 बार सूरह इखलास इसका सवाल खातून ए जन्नत बीबी फातिमा जहरा रजी अल्लाहा को नज्र करें फ़ज़ीलत: आप फ़रमाती हैं कि इस नमाज पढ़ने वाले की शफ़ाअत किए बिना जन्नत में कदम ना रखूंगी|
सलातुत तस्बीह का आसान तरीका
तस्बीह “सुब्हानअल्ला हि वलहम्दु लिल्ला हि वला इला ह इल्लल्ला हु वल्लाहु अकबर”
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
सबसे पहले सलातुत तस्बीह की नियत करें (चार रकअत एक सलाम से)
तर्जुमा: नीयत की मैंने 4 रकअत सलातुत तस्बीह, वास्ते अल्लाह तआला के, मुंह मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़। अल्लाहु अकबर।
फिर सना (सुब्हानाक अल्लाहुम्मा…) के बाद 15 मरतबा तस्बीह पढ़ें। फिर
आउजु बिल्ला हि मि नश्शैता निर्र जीम बिस्मिल्लाहिर र्रहमानिर्र हीम
सुरह फ़ातिहा (अल्हम्दोलिल्ला हि रब्बिल आ लमीन….) सूरे मिलाइये (कुरआन की कम से कम तीन आयतें या जो चाहें) सूरे मिलाने के बाद 10 बार
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
फिर रुकूअ् में 10 मरतबा
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
पढ़ें । फिर (रुकूअ् से खड़े होकर)
क़याम (समिअल्ला हु लेमन ह मे दह रब्बना लक लहम्द के बाद) में 10 मरतबा
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
पढ़ें। फिर सज्दे में 10 मरतबा (सुब्हान रब्बिल आला के बाद) पढ़ें।
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
फिर (सज्दे के दरमियान) जल्सा में 10 मरतबा
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
पढ़ें। फिर दूसरे सज्दे में 10 मरतबा (सुब्हान रब्बिल आला के बाद)
سُبْحَانَ اللّٰہِ، وَالْحَمْدُ لِلّٰہِ، وَلَا إِلٰہَ إِلاَّ اللّٰہُ، وَاللّٰہُ أَکْبَرُ
पढ़ें। फिर अगली रकअत के लिए खड़े हो जाएं। इस तरह पहली रकअत में 75 मरतबा पढ़ें, दूसरी रकअ्त में 75 मरतबा पढ़ें। यानी खड़े होते ही पहले 15 बार फिर सूरे मिलाने के बाद 10 बार फिर रुकूअ् में 10 बार फिर क़याम में 10 बार फिर सजदे में 10 बार फिर जलसा में 10 बार फिर दूसरे सजदे में 10 बार। दूसरी रकात में कअ्दा में बैठकर अत्तहियात पढ़ें और फिर तीसरी रकात के लिए खड़े हो जाएं। तीसरी रकअ्त में 75 मरतबा और चौथी रकअ्त में 75 मरतबा तस्बीह पढ़ें। चौथी रकात में कअदा में बैठकर अत्तहियात, दरूद इब्राहिम और दुआ पढ़कर नमाज़ मुकम्मल करें। इस तरह चार रकअत में कुल 300 मरतबा तस्बीह पढ़ी जाएगी।
शब ए बरात की फज़ीलत और नफ्ल नमाजे़ं
Friday, February 15, 2019
﷽
حَدَّثَنِي يُونُسُ بْنُ عَبْدِ الْأَعْلَی أَخْبَرَنَا ابْنُ وَهْبٍ قَالَ وَأَخْبَرَنِي عَمْرٌو أَنَّ أَبَا يُونُسَ حَدَّثَهُ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ عَنْ رَسُولِ اللَّهِ صَلَّی اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّهُ قَالَ وَالَّذِي نَفْسُ مُحَمَّدٍ بِيَدِهِ لَا يَسْمَعُ بِي أَحَدٌ مِنْ هَذِهِ الْأُمَّةِ يَهُودِيٌّ وَلَا نَصْرَانِيٌّ ثُمَّ يَمُوتُ وَلَمْ يُؤْمِنْ بِالَّذِي أُرْسِلْتُ بِهِ إِلَّا کَانَ مِنْ أَصْحَابِ النَّارِ
[Sahih Muslim:Vol;1,No.]
It is narrated on the authority of Abu Hurairahرضی اللہ عنہ that the Messenger of Allahﷺ observed: By Him in Whose hand is the life of Muhammad, he who amongst the community of Jews or Christians hears about me, but does not affirm his belief in that with which I have been sent and dies in this state (of disbelief), he shall be but one of the denizens of Hell-Fire.
Narrated by H.AbuHuraira in Muslim&Musnad-e-Ahmad&Mustadrak 1-1 time.
Islam is the only way
﷽
حَدَّثَنَا أَبُو بَکْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ وَزُهَيْرُ بْنُ حَرْبٍ جَمِيعًا عَنْ ابْنِ عُلَيَّةَ قَالَ زُهَيْرٌ حَدَّثَنَا إِسْمَعِيلُ بْنُ إِبْرَاهِيمَ عَنْ أَبِي حَيَّانَ عَنْ أَبِي زُرْعَةَ بْنِ عَمْرِو بْنِ جَرِيرٍ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ قَالَ کَانَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّی اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ يَوْمًا بَارِزًا لِلنَّاسِ فَأَتَاهُ رَجُلٌ فَقَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا الْإِيمَانُ قَالَ أَنْ تُؤْمِنَ بِاللَّهِ وَمَلَائِکَتِهِ وَکِتَابِهِ وَلِقَائِهِ وَرُسُلِهِ وَتُؤْمِنَ بِالْبَعْثِ الْآخِرِ قَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا الْإِسْلَامُ قَالَ الْإِسْلَامُ أَنْ تَعْبُدَ اللَّهَ وَلَا تُشْرِکَ بِهِ شَيْئًا وَتُقِيمَ الصَّلَاةَ الْمَکْتُوبَةَ وَتُؤَدِّيَ الزَّکَاةَ الْمَفْرُوضَةَ وَتَصُومَ رَمَضَانَ قَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَا الْإِحْسَانُ قَالَ أَنْ تَعْبُدَ اللَّهَ کَأَنَّکَ تَرَاهُ فَإِنَّکَ إِنْ لَا تَرَاهُ فَإِنَّهُ يَرَاکَ قَالَ يَا رَسُولَ اللَّهِ مَتَی السَّاعَةُ قَالَ مَا الْمَسْئُولُ عَنْهَا بِأَعْلَمَ مِنْ السَّائِلِ وَلَکِنْ سَأُحَدِّثُکَ عَنْ أَشْرَاطِهَا إِذَا وَلَدَتْ الْأَمَةُ رَبَّهَا فَذَاکَ مِنْ أَشْرَاطِهَا وَإِذَا کَانَتْ الْعُرَاةُ الْحُفَاةُ رُئُوسَ النَّاسِ فَذَاکَ مِنْ أَشْرَاطِهَا وَإِذَا تَطَاوَلَ رِعَائُ الْبَهْمِ فِي الْبُنْيَانِ فَذَاکَ مِنْ أَشْرَاطِهَا فِي خَمْسٍ لَا يَعْلَمُهُنَّ إِلَّا اللَّهُ ثُمَّ تَلَا صَلَّی اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِنَّ اللَّهَ عِنْدَهُ عِلْمُ السَّاعَةِ وَيُنَزِّلُ الْغَيْثَ وَيَعْلَمُ مَا فِي الْأَرْحَامِ وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ مَاذَا تَکْسِبُ غَدًا وَمَا تَدْرِي نَفْسٌ بِأَيِّ أَرْضٍ تَمُوتُ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ قَالَ ثُمَّ أَدْبَرَ الرَّجُلُ فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّی اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ رُدُّوا عَلَيَّ الرَّجُلَ فَأَخَذُوا لِيَرُدُّوهُ فَلَمْ يَرَوْا شَيْئًا فَقَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّی اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ هَذَا جِبْرِيلُ جَائَ لِيُعَلِّمَ النَّاسَ دِينَهُمْ
[Sahih Muslim:vol 1,Hadees No,100]
Abu Hurairahرضی اللہ عنہ reported: One day the Messenger of Allahﷺ appeared before the public that a man came to him and said: Prophetﷺ of Allah, (tell me) what is Iman (Faith). Upon this he (the Holy Prophet) replied: That you affirm your faith in Allah, His angels, His Books, His meeting, His Messengers and that you affirm your faith in the Resurrection hereafter. He (again) said: Messenger of Allah, (tell me) what does al-Islam signify. He (the Holy Prophet) replied: Al-Islam signifies that you worship Allah and do not associate anything with Him and you establish obligatory prayer and you pay the obligatory poor-rate (Zakat) and you observe the fast of Ramadan. He (the inquirer) again said: Messenger of Allah, what does al-Ihsan imply? He (the Holy Prophet) replied: That you worship Allah as if you are seeing Him, and in case you fail to see Him, then observe prayer (with this idea in your mind) that (at least) He is seeing you. He (the inquirer) again said: Messenger of Allah, when would there be the Hour (of Doom)? He (the Holy Prophet) replied: The one who is asked about it is no better informed than the inquirer. I, however, narrate some of its signs (and these are): when the slave-girl will give birth to her master, when the naked, barefooted would become the chiefs of the people - these are some of the signs of (Doom). (Moreover) when the shepherds of the black (camels) would exult themselves and compete with others in the construction of higher buildings, this is one of the signs of (Doom). (Doom) is one of the five (happenings wrapped in the unseen) which no one knows but Allah. Then he (the Messenger of Allahﷺ) recited (the verse):" Verily Allah! with Him Alone is the knowledge of the Hour and He it is Who sends (down the rain) and knows that which is in the wombs and no person knows whatsoever he shall earn tomorrow, and a person knows not in whatsoever land he shall die. Verily Allah is Knowing, Aware. He (the narrator, Abu Hurairahرضی اللہ عنہ ) said: Then the person turned back and went away. The Messenger of Allahﷺ said: Bring that man back to me. They (the Companions of the Holy Prophetﷺ present there) went to bring him back, but they saw nothing there. Upon this the Messenger of Allahﷺ remarked: he was Gabriel (علیہ السلام), who came to teach the people their religion.
Narrated by H. AbuHuraira in Bukhari 2 times,in Muslim 3,in AbuDauood 1,in Ibn-e-Maza 2,in Nisaei 1,in Musnd-e-Ahmad 3.
Faith in Islam
﷽
حَدَّثَنَا عُبَيْدُ اللَّهِ بْنُ مُوسَی قَالَ أَخْبَرَنَا حَنْظَلَةُ بْنُ أَبِي سُفْيَانَ عَنْ عِکْرِمَةَ بْنِ خَالِدٍ عَنْ ابْنِ عُمَرَ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّی اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ بُنِيَ الْإِسْلَامُ عَلَی خَمْسٍ شَهَادَةِ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ وَإِقَامِ الصَّلَاةِ وَإِيتَائِ الزَّکَاةِ وَالْحَجِّ وَصَوْمِ رَمَضَانَ
[Bukhari(1) Hadees No7]
Narrated Ibn 'Umar رضی اللہ عنہ : Allah's Apostleﷺ said: Islam is based on (the following) five (principles):
1. To testify that none has the right to be worshipped but Allah and Muhammadﷺ is Allah's Apostle(Messanger).
2. To offer the (compulsory congregational) prayers dutifully and perfectly.
3. To pay Zakat (i.e. obligatory charity).
4. To perform Hajj. (i.e. Pilgrimage to Makkah)
5. To observe fast during the month of Ramadan.
۞Narrated by Ibn'Umar رضی اللہ عنہ In Bukhari 1time,in Muslim 4,in Tirmizi 2,in Nisaei 1,in Musnad-e-Ahmad 4 times.
Five Pillers of Islam
Thursday, February 14, 2019
﷽
عَنْ عُمَرَ بْنِ الْخَطَّابِ قَالَ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّی اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ إِنَّمَا الْأَعْمَالُ بِالنِّيَّةِ وَإِنَّمَا لِامْرِئٍ مَا نَوَی فَمَنْ کَانَتْ هِجْرَتُهُ إِلَی اللَّهِ وَرَسُولِهِ فَهِجْرَتُهُ إِلَی اللَّهِ وَرَسُولِهِ وَمَنْ کَانَتْ هِجْرَتُهُ لِدُنْيَا يُصِيبُهَا أَوْ امْرَأَةٍ يَتَزَوَّجُهَا فَهِجْرَتُهُ إِلَی مَا هَاجَرَ إِلَيْه
{Sahih Muslim (3) Hadees No.430}
{Sahih Muslim (3) Hadees No.430}
It has been narrated on the authority of Umar bin al-Khattab that the Messenger of Allahﷺ said: (The value of) an action depends on the intention behind it. A man will be rewarded only for what he intended. The emigration of one who emigrates for the sake of Allah and His Messengerﷺ is for the sake of Allah and His Messengerﷺ; and the emigration of one who emigrates for gaining a worldly advantage or for marrying a woman is for what he has emigrated.
۞Narrated By H.Umar in Bukhari 6 times. And in muslim 2&Abudauood 1&Nisaee 3 &Tirmizi 1&Musnad-e-Ahmad 2times.
The value of Intention in Islam
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